2x2 मिमी के टूटे रुद्राक्ष पर बनाई भगवान पशुपतिनाथ की अद्वितीय छवि
नीमच। जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित जीरन तहसील के कुचड़ोद गांव के युवा कलाकार राहुल लोहार ने अपनी अनोखी कला से एक बार फिर सबको चौंका दिया है। राहुल ने मात्र 2x2 मिलीमीटर से भी छोटे खंडित रुद्राक्ष पर मंदसौर के प्रसिद्ध भगवान पशुपतिनाथ की बारीक चित्रकारी कर एक अद्भुत उदाहरण पेश किया। इस चित्रकारी को साधारण आंखों से नहीं, बल्कि बिल्लोरी कांच (मैग्निफाइंग ग्लास) से देखने पर पूरी भव्यता के साथ दिखाई देता है।
राहुल की इसी उपलब्धि पर मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री जगदीश जी देवड़ा से बीते दिवस मुलाकात की। इस अवसर पर राहुल ने रुद्राक्ष पर बनाई गई भगवान पशुपतिनाथ की सूक्ष्म पेंटिंग उप मुख्यमंत्री जी को भेंट की। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री श्री जगदीश जी देवड़ा ने इस अनोखी कलाकृति का अवलोकन कर भरपूर सराहना की तथा भारतीय कला-संस्कृति को सशक्त बनाने में नीमच जिले के राहुल लोहार के प्रयासों की प्रशंसा करते हुवे राहुल का प्रोत्साहन किया।
देशी रंगों से बनी दिव्य छवि-
राहुल ने इस चित्र में किसी भी महंगे या कृत्रिम रंग का उपयोग नहीं किया। उन्होंने गेरू, सफेदा और देसी गोंद जैसे पारंपरिक रंगों से चित्र को उकेरा, जो उनकी कला और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। बिना किसी आधुनिक ब्रश या तकनीकी उपकरण के, उन्होंने मात्र तीन घंटे की अथक मेहनत में यह चित्र तैयार किया।
खंडित रुद्राक्ष बना प्रेरणा का माध्यम-
राहुल ने बताया कि यह विचार उन्हें तब आया जब उन्होंने घर में एक टूटा हुआ रुद्राक्ष देखा, जिसे पहले नदी में प्रवाहित करने का सोचा गया था। लेकिन बाद में उन्होंने इस खंडित रुद्राक्ष पर मंदसौर के प्रसिद्ध भगवान पशुपतिनाथ की सूक्ष्म छवि बनाने का निश्चय किया। आज यह कलाकृति दर्शाती है कि भक्ति और सृजनात्मकता के मेल से किसी भी वस्तु को अनुपम सौंदर्य में बदला जा सकता है।
आंखों से नहीं, भावनाओं से देखने योग्य कला-
यह सूक्ष्म चित्र इतनी बारीकी से बनाई गई है कि नंगी आंखों से देखना कठिन है, लेकिन मैग्निफाइंग ग्लास से देखने पर भगवान पशुपतिनाथ की मूर्ति की हर रेखा, भाव और रंग स्पष्ट नजर आते हैं। यह कलाकृति दर्शाती है कि कला केवल दृष्टि से नहीं, बल्कि संवेदना से भी अनुभव की जाती है।
आसान नहीं था आकार देना-
राहुल मानते हैं कि इतने छोटे और गोल सतह पर साफ व सटीक आकृति बनाना बेहद कठिन था। लेकिन उन्होंने न केवल यह चुनौती स्वीकार की, बल्कि उसे इतनी खूबसूरती से पूरा भी किया कि आज यह काम पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है। कला को पहचान मिलना जरूरी-राहुल लोहार की यह बारीक और परंपरागत कला बताती है कि संसाधनों से नहीं, संकल्प से इतिहास रचे जाते हैं। अब जरूरत है ऐसे कलाकारों को मंच देने और प्रोत्साहन देने की, ताकि गांवों की प्रतिभा विश्वपटल तक पहुंच सके।
परंपरा में पले-बढ़े कलाकार की प्रेरणादायक यात्रा
राहुल लोहार का जन्म एक सामान्य ग्रामीण परिवार में हुआ। उनके माता-पिता देवीलाल लोहार एवं शांति बाई लोहार ने उन्हें संस्कार, अनुशासन और सेवा जैसे मजबूत मूल्यों के साथ पाला। बचपन से ही राहुल में सामाजिक चेतना और कला के प्रति रुचि का अनूठा समन्वय देखने को मिला। समय के साथ राहुल ने अपनी रुचियों को एक बहुआयामी पहचान दी। उनकी कलाकृतियाँ न केवल स्थानीय संस्कृति की गहराई को उजागर करती हैं, बल्कि उनमें वैश्विक स्तर की संवेदनशीलता भी देखने को मिलती है। उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों से भी सम्मान प्राप्त हो चुका है।
ग्रामीण युवाओं के लिए आदर्श बना एक कलाकार-
आज राहुल लोहार सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रेरणास्रोत हैं। वह रचनात्मकता को विवेक के साथ और स्थानीय मूल्यों को वैश्विक सोच के साथ जोड़ने वाले युवा नेता के रूप में उभर रहे हैं। चाहे वह उनकी चित्रकारी हो, सामाजिक अभियान हों या नेतृत्व कार्यक्रम हर कार्य में उनकी सोच स्पष्ट है सृजन से परिवर्तन लाना, परंपरा को बचाना और समाज को आगे बढ़ाना। ग्रामीण भारत के हजारों युवाओं के लिए राहुल की यह यात्रा एक स्पष्ट संदेश देती है कि यदि दृष्टि सच्ची, प्रयास निरंतर और मन साफ हो, तो कोई भी बाधा व्यक्ति को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।


